मैं तो बस अपनी पहचान ढूंढती हूँ
दो मुठ्ठी आसमान ढूंढती हूँ .

न हों बेड़ियाँ जहाँ पर कुरीतियों की
ऐसा छोटा सा जहाँ ढूंढती हूँ

न गाड़ी न मोटर न मकान ढूंढती हूँ
दे सुकून जो दिल को वो छाँव ढूंढती हूँ
कहने को लाखों रिश्ते जहाँ में मेरे
जो पढ़ सके मेरे मन को वो इंसान ढूंढती हूँ .

ना ख्वाहिशें बड़ी हैं न हैं बड़ी ज़रूरत
मैं तो बस अपनों की नज़र में सम्मान ढूंढती हूँ .

मैं खो चुकी कहीं इन रिश्तों की भंवर में
लेकिन अब भी कट चुके पंखों में जान ढूंढती हूँ.

मैं तो बस अपनी पहचान ढूंढती हूँ
दो मुठ्ठी आसमान ढूंढती हूँ .

ये कविता खुशबू सिंह ने लिखी है. ये गाना भी बहुत अच्छा गाती हैं, अगली बार सुनवाएंगे.

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