नाम-  नरेश, “नरेश अग्रवाल”
काम- पार्टी बदलना.

साल 1980. जब पहली बार हरदोई से कांग्रेस के टिकट से नरेश अग्रवाल विधायक चुने गए. 1997 में कांग्रेस के विधायकों के साथ एक नई पार्टी बनाई और कल्याण सिंह को विश्वास मत हासिल करने में मदद की. वह कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के शासनकाल में ऊर्जा मंत्री रहे.

साल 2002. इस साल नरेश अग्रवाल सपा में चले गए. चुनाव लड़ा. जीता भी और परिवहन मंत्री बन गए.

साल 2007 में विधानसभा चुनाव हुआ. नरेश अग्रवाल सपा के टिकट पर हरदोई से विधायकी का चुनाव लड़े. फिर जीते. लेकिन सरकार हार गई. सरकार बनी मायावती की . अग्रवाल जी ने मौका देखा और बसपा में शामिल हो गए.

“रम में राम बसाने” वाले ‘नरेश अग्रवाल’ को भाजपा से इश्क हो गया है.

साल 2012. इस बार के विधानसभा चुनाव में सपा का बोलबाला था. अखिलेश यादव अपने चरम पर थे. अग्रवाल साहब ने इधर-उधर देखा और बसपा छोड़ सपा में चले आए. इस बार अपने बेटे नितिन अग्रवाल को भी ले आए. बेटा जवान था, सरकार भी जवान थी. तिगड़म लगाए और बेटा को मंत्री बनवा दिए. खुद राज्यसभा चले गए. कुछ दिन बाद सपा ने इनको राष्ट्रीय महासचिव भी बना दिया.

साल 2018. मौका देख अग्रवाल साहब बीजेपी के साथ सत्ता के रथ पर सवार हो गए हैं. बीजेपी में आने की सबसे बड़ी बजह बताई जा रही है राज्यसभा चुनाव. क्यों कि नरेश अग्रवाल का सपा ने राज्यसभा का टिकट काट दिया था(मतलब भगा दिया था). बीजेपी में मौका था तो चले आए.

खबर तो ये भी है कि 2019 के चुनाव में नरेश अग्रवाल को बीजेपी के टिकट से लोकसभा का चुनाव भी लड़ सकते हैं. लेकिन अग्रवाल साहब का कहना है कि “जब तक कोई राष्ट्रीय पार्टी में न रहे, पूरे राष्ट्र की सेवा नहीं कर सकता. इसीलिए वह बीजेपी में शामिल हुए हैं. वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित हैं उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ से प्रभावित हैं. सरकार देश में अच्छा काम कर रही है. पीएम के नेतृत्व में पूरा देश आगे बढ़ रहा है इस लिए मै बीजेपी में शामिल हुआ हूं. वो भी बिना किसी शर्त के.

नरेश जी ने राज्यसभा वाली बात भी बताई है. उनका कहना है कि “मेरा बेटा जो कि सपा विधायक है, राज्यसभा चुनाव में बीजेपी को समर्थन करेगा.