साल 1992 में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया. साल 1993 चुनाव हुए. उस वक्त प्रदेश में बाबरी विध्वंस की वजह से राष्ट्रपति शासन चल रहा था. मंदिर-मस्जिद विवाद के चलते ध्रुवीकरण चरम पर था. राजनीतिक पार्टियां यह बात समझ चुकी थीं.

उसी के मद्देनजर धुरविरोधी पार्टियों के प्रमुख मुलायम सिंह यादव और मायावती ने एक साथ चुनाव लड़ने का फैसला किया. साथ चुनाव लड़ने की सबसे बड़ी वजह थी ‘राम लहर’ को रोकना.

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चुनाव के नतिजे आए किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. एसपी-बीएसपी गठबंधन को 176 सीटें मिली और बीजेपी को 177 सीटें मिली थी. जिसके बाद एसपी-बीएसपी गठबंधन ने 4 दिसंबर 1993 को सत्ता की बागडोर संभाल ली. मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुखिया बने. लेकिन, आपसी मनमुटाव के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा कस लिया और समर्थन वापसी की घोषणा कर दी. इस वजह से मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ कर गिर गई. जिसके बाद 3 जून, 1995 को मायावती ने बीजेपी के साथ मिलकर सत्ता की बागडोर संभाली.

बीजेपी की लहर को रोकने के लिए एक बार फिर एसपी और बीएसपी साथ आ रहे है.

4 मार्च की दोपहर को समाचार एसेंजी एएनआई के हवाले से खबर आई कि मायावती और अखिलेश 25 साल बाद साथ आ गए हैं. सबसे पहले समर्थन की बात इलाहाबाद से उठी. बीएसपी से इलाहाबाद के जोनल कोऑर्डिनेटर अशोक गौतम के हवाले से एएनआई ने दावा किया कि बीएसपी ने फूलपुर के प्रत्याशी नागेंद्र सिंह पटेल को समर्थन देने का फैसला किया है.

 

इसके कुछ ही देर बाद गोरखपुर से भी ऐसी ही खबर आई. वहां के बीएसपी इन्चार्ज घनश्याम चंद्र खरवार के हवाले से कहा गया कि बीएसपी ने सपा प्रत्याशी प्रवीन कुमार निषाद को समर्थन देने का फैसला किया है.

इसके बाद मायावती ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का ऐलान कर दिया. 4 मार्च को जब पत्रकार मायावती की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचे, तो उन्हें उम्मीद थी कि मायावती गठबंधन की औपचारिक घोषणा करेंगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मायावती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और सपा और बसपा के गठबंधन को सिरे से खारिज कर दिया.

 

इसके बाद मायावती ने अपनी चुनावी रणनीति बताते हुए कहा कि भले ही इस उपचुनाव में बीएसपी ने कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है, लेकिन बीएसपी के वोटर वोट तो देने जाएंगे. और पार्टी की ओर से उनसे बस इतना सा कहा गया है कि वो उसी प्रत्याशी को वोट देंगे, जो बीजेपी के प्रत्याशी को हरा सके.

सूत्रों की मानें तो यह फैसला यूं ही नहीं हुआ है. इसके लिए 6 दिनों तक दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच व्यापक बातचीत हुई. एसपी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, ‘इसकी शुरुआत 27 फरवरी को उस समय हुई, जब पार्टी के वरिष्ठ रणनीतिकार राम गोपाल यादव ने यह मुद्दा बीएसपी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा से उठाया.’ उन्होंने बताया कि दोनों ही पक्षों ने गठजोड़ की संभावनाओं पर चर्चा की.

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बीएसपी प्रमुख मायावती और एसपी चीफ अखिलेश यादव से हरी झंडी मिलने के बाद अगले दौर की बातचीत में समर्थन की विस्तृत शर्तों पर बातचीत हुई. दूसरे दौर की बातचीत में दोनों ही पक्षों ने आगामी राज्यसभा चुनाव और विधान परिषद चुनाव में एक-दूसरे के समर्थन पर सहमति जताई. यह फैसला लिया गया कि एसपी राज्यसभा चुनाव में बीएसपी का समर्थन करेगी, बीएसपी विधान परिषद चुनाव में समाजवादी उम्मीदवारों को अपना समर्थन देगी.

इसके बाद यह मुद्दा 1 मार्च को पार्टी के क्षेत्रीय कोऑर्डिनेटरों की मायावती के साथ बैठक में उठा. इस बैठक में मायावती ने एसपी के साथ गठजोड़ पर जमीनी कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेने के लिए कहा.

उधर, अखिलेश ने भी अपने खास एमएलसी उदयवीर सिंह को जमीनी स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेने के लिए कहा. इसके बाद दोनों पक्षों के बीच गोरखपुर और फूलपुर में कई बैठकें हुईं, जो शनिवार शाम तक चलती रहीं. जमीनी कार्यकर्ताओं से सकारात्मक फीडबैक मिलने के बाद मायावती ने समर्थन की घोषणा की.

हालांकि मायावती ने ये भी कहा कि जब 2019 में लोकसभा के चुनाव होंगे, तो उस वक्त गठबंधन की बात की जाएगी. फिलहाल किसी तरह का गठबंधन नहीं है. इससे पहले समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव कई बार खुले मंच से बीएसपी के साथ गठबंधन की वकालत कर चुके हैं, लेकिन मायावती ने हर बार इस गठबंधन से इन्कार ही किया है.