महाराष्ट्र सरकार और सूबे के किसानों के बीच समझौता हो गया. किसानों ने 7 मार्च को शुरू किया अपना आंदोलन 12 मार्च को वापस ले लिया. 12 मार्च को मुंबई के विधान भवन में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डनवीस की अध्यक्षता में महाराष्ट्र सरकार और किसानों के प्रतिनिधिमंडल के बीच एक बैठक हुई.

इस बैठक के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डनवीस ने कहा है, “हमने किसानों की सभी माँगें मान ली हैं और उन्हें भरोसा दिलाने के लिए एक लिखित पत्र भी जारी किया है. किसान मार्च शुरू होने के पहले दिन से ही हम कोशिश कर रहे थे कि किसानों के साथ बातचीत की जाए. हमारे मंत्री गिरीश महाजन शुरुआत से ही किसानों के संपर्क में थे.”

 

कैसे हुआ इतना बड़ा आन्दोलन –

6 दिन पहले लगभग 35000 किसान अखिल भारतीय किसान सभा की अगुवाई में नासिक से पैदल 180 किलोमीटर की यात्रा करके कल शाम मुम्बई के आज़ाद मैदान पहुँचे. 1936 में वामपंथी दल से अलग हो कर बनी किसान सभा के गठन का उद्देश्य ज़मींदारी की खिलाफ़त और किसानों का हित था लेकिन अभी इतनी बड़ी संख्या में इतना लम्बा सफ़र तय करके एक व्यापक आन्दोलन करने की कुछ बेहद स्पष्ट वजहें सामने आई .

किसानों ने आंदोलन खत्म करने का दिया आश्वासन

सबसे पहले किसानों की कर्ज़माफी उसके पश्चात वन्य भूमि पर खेती कर रहे किसानों को उस भूमि का स्वामित्व दिया जाए, नदी जोड़ योजना के तहत किसानों को सिंचाई का पानी मिले और अंत में सबसे महत्वपूर्ण स्वामीनाथन आयोग के प्रस्तावों को स्वीकृति मिले . सभी माँगें समझने के लिहाज़ से सतही हैं सिवाय स्वामीनाथन आयोग के प्रस्ताव के, 18 नबम्वर 2004 को तत्कालीन सरकार ने NCF (National Commission on Farmers) का गठन किया जिसके मुखिया थे एम.एस.स्वामीनाथन जिसका एक मात्र लक्ष्य किसान और कृषि का निरंतर विकास था .

35,000 किसान VS महाराष्ट्र सरकार

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए NCF के तहत आने वाले स्वामीनाथन आयोग ने सरकार के समक्ष पाँच रिपोर्ट पेश की जिसमें से 4 अक्तूबर 2006 को पेश की गई पाँचवी रिपोर्ट सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गई और मुम्बई के आज़ाद मैदान में आन्दोलनरत किसानों की माँगें इस पाँचवी रिपोर्ट के इर्द गिर्द घूमती हैं . अब प्रश्न उठता है कि स्वामीनाथन आयोग की उस रिपोर्ट में ऐसे क्या प्रस्ताव थे ? उस रिपोर्ट की शुरुआत एक विश्लेषण से हुई जिसके अनुसार किसानों को ज़मीन, पानी, जैविक संसाधान, तकनीक और बाज़ार इन सभी दृष्टिकोणों से मज़बूत करना होगा . इसके बाद कुछ प्रस्ताव थे,

* भूमि मालिकाने में सुधार
* सिंचाई सम्बंधी सुधार
* फ़सल उत्पादन में वृद्धि
* फ़सल के ऋण पर ब्याज की दरों को चार प्रतिशत कम किया जाए
*किसान आत्महत्याओं को तत्काल प्रभाव से रोका जाए

आपको याद होगा कि पंजाब और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने इस वर्ष ही किसानों का कर्ज़ माफ़ किया हैं लेकिन क्या कर्ज़ माफ़ होना ही समाधान है ? और यह कैसे सुनिश्चित हौगा कि कर्ज़ माफ़ होने से भविष्य में कोई समस्या नहीं होगी ?

NCRB की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में होने वाली आत्महत्याओं में 11 प्रतिशत आत्महत्याएँ किसानों द्वारा की जाती है और किसानों की आत्महत्या की दर में कोई गिरावट भी नहीं है जिसके एक मायने बेहद साफ हैं कि किसानों से जुड़ी किसी हुई किसी भी चीज़ की स्थिति अच्छी नहीं है अब वह चाहे नीतियां हों या खुद किसानों का खेतों में काम करने का तरीक़ा . प्रदेश सरकार के साथ केंद्र सरकार को समझना होगा कि प्रदेश में किसानों की समस्या का क्या प्रारूप है ?

हमेशा से होता यही रहा है कि सरकारों के लुभावन में आकर किसान मात्र वोट बैंक बन कर रह जाते हैं और उनकी सुध लेने के वक्त सरकार मौन धारण कर लेती है, चिंता का विषय यही है कि कहीं इस आन्दोलन की खींचतान की शक्ल राजनैतिक ना हो जाए और किसान हमेशा की तरह दरकिनार कर दिया जाए .

ऐसा बताया जा रहा है कि उन आन्दोलन करने वालों में आदिवासी समुदाय भी हैं और पूरे आन्दोलन को CPM का समर्थन प्राप्त है, जिनका कहना है कि सरकार अब अन्नदाताओं की कर्ज़माफी जैसे महत्वपूर्ण पहलू पर भी असफ़ल है . हालांकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने किसानों से मिलने की बात कही है लेकिन वह भी समाधान नहीं है और सरकार को भी यह समझना होगा कि इस कर्ज़माफी की नींव पर खड़े इस आन्दोलन में बेहतर बेहतर समाधान क्या हो सकता है ?

इस देश में किसानों की झोली में हमेशा निराशा ही गिरी है और एक कृषि प्रधान देश में किसानों की स्थिति इतनी दयनीय होने पर क्या कहा जा सकता है ?

“लबादे को पोशाक और जीव को बालक समझ लीजिए”. नाम है विभव देव शुक्ला. ये लेख इसी बालक ने लिखा है.

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