इस देश का दुर्भाग्य है कि जब जब किसानो ने आंदोलन किये है , उसको चुनाव के परिपेक्ष में जोड़ कर कमजोर करने की कोशिश की जाती है और एक हद तक वो लोग इसमें सफल भी हो जाते है .वो लोग जो अन्नपूर्णा का पैकेज्ड आंटा खाते है, वो लोग जो बासमती का लम्बा वाला चावल खाते है और वो लोग जो कुरकुरे फाड़ का उसका हवा सूंघते है और फिर मदमस्त होकर क्रंची मंची सा फील करते है .

वो लोग कहते है कि किसानो की समस्या पे बात नहीं हो रही है , आंदोलन को राजनैतिक रूप दिया जा रहा है और इसके पीछे विपक्षी पार्टियां फायदा उठा रही है.

 

किसान की समस्या पे कौन बात करेगा ? और क्या बात करेगा ? प्राइम टाइम पे या आपके टाइमलाइन पे इस बात पे कभी बहस हुई कि एक रिकवरी एजेंट ने एक किसान को उसी के ट्रेक्टर से उसी के खेत में इसलिए कुचल दिया क्यूंकि वो अपने ट्रेक्टर का आखिरी इन्स्टालमेन्ट नहीं दे पाया ? क्या आप किसान इस बात पे लिख सके सरकार MSP बढ़ा कर महंगाई कैसे कण्ट्रोल कर पाएगी ? क्या आप इस बात पे भी लिख सके कि इन चार सालो में किसानो की आत्महत्या में इतनी वृद्धि क्यों हो रही है ? आखिर बार आपने किस किसान के बारे में लिखा था ?

किसान की समस्या के बारे में किसको पता नहीं है ? अगर पता नहीं है तो फडणवीस क्यूंकि लत्ते पत्ते भागे उनसे मिलने, क्या ये बात सही नहीं है कि उनसे किया हुआ वादा ये सरकार पूरा नहीं कर पायी ? बताइये ?

ये हर बार एक ही बहाना कि चुनाव आने वाले है इसलिए ऐसा हो रहा है , ऐसा कब तक चलेगा ? चुनाव तो हर महीने हो रहे है तो इसका क्या मतलब , किसान कब आंदोलन करे , जब क्लास मॉनिटर का चुनाव हो तब या तब जब किसी सरपंच का चुनाव हो रहा हो तब ? ये एक सेट पैटर्न बन गया है , जब जंतर मंतर पे ये सब आये तो कहा गया चुनाव आने वाले है , आज महाराष्ट्र पहुंचे तो कहा जा रहा है चुनाव आने वाले है और त्रिपुरा कि हार का बदला लेफ्ट ले रही है .ये कैसा कुतर्क है ? क्या ये 50 हज़ार लोग लेफ्ट के कार्यकर्ता है ? अगर है भी और आपको पता भी है तो आप इनसे संवाद क्यों कर रहे है ? ये कैसा झूठ फैलाया जा रहा है ?

35,000 किसान VS महाराष्ट्र सरकार

जब हर साल आप इंसेंटिव और सब्सिडी के नाम पर कॉर्पोरेट्स को दान दे ही देते है तो किसानो के वक़्त आपके हाँथ में दर्द क्यों होने लगता है ? भाषण बाज़ी में आप बिहार को एक लाख करोड़ का पैकेज देकर आ गए , लेकिन दिया कितना ? घंटा ? इसपर कौन बात करेगा ? कोई नहीं .

‘आशा है इस आन्दोलन से किसानों की उन्नति की तस्वीर कुछ बेहतर बने’

सवाल बहुत सारे है , जवाब भाजपा को ही देना होगा .ये भर दिन स्वच्छ भारत और भ्रष्टाचार मुक्त का लौंडा नाच बहुत हुआ क्यूंकि जो पार्टी नारायण राणे और येदुरप्पा जैसे सर्टिफाइड भ्रष्टाचारियो को लेकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत की कल्पना करवा रहा है वो एक बेईमानी है .अब लोग कहेंगे आरोप साबित नहीं हुए है तो आप कैसे उसको भ्रष्टाचारी कह सकते है , कलमाड़ी और डी राजा पे भी कुछ साबित नहीं हुआ है , ये प्रिविलेज आप इन दोनों को क्यों नहीं देते ?

भाजपा को लाल रंग से दिक्कत है , सीरियसली ? पंद्रह साल पहले तो इसी लाल रंग की होली खेलकर यहां तक पहुंचे हो , अब अचानक से इतनी घृणा ?

 

“हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे “

ये शायरी अहमद फ़राज़ ने लिखा है. और ये लेख इस तस्वीर में दिख रहे महोदय ने. नाम है धैर्यकांत, “धैर्यकांत मिश्रा”.

Note: ‘ये लेखक के निजी विचार है’