बर्थडे स्पेशल: जब तीन बारातियों के साथ दुल्हन लेने पहुंच गए थे फ़ैज़

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3 फरवरी 1911 में पंजाब के नारनौल कस्बे में एक पैदा हुए फैज़ अहमद फैज़. पिता चौधरी सुल्तान अहमद एक मशहूर वकील थे. पांच बहनें और चार भाई थे. फैज़ की फैमिली बेहद ही इस्लामिक थी. उनकी जिंदगी के किस्से तो बहुत हैं. मगर यहां उनकी जिंदगी का मुख़्तसर सा तब्सिरा है. उन्हें कम्युनिस्ट कहा गया. इस्लाम के खिलाफ भी बताया गया. लेकिन उनका कहना था कि ये उनपर सिर्फ इल्जाम हैं सच नहीं.

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल जबां अब तक तेरी है
तेरा सुतवां, जिस्म है तेरा
बोल कि जां अब तक तेरी है

जिन दिनों फ़ैज़ पढाई-लिखाई कर रहे थे. उन दिनों मुल्क की हवाओं में राजनीतिक रंग बेहद तेज़ी के साथ घुल रहे थे. किसानों-मज़दूरों के आन्दोलन का दौर था. कॉलेजों में देश-दुनिया को लेकर चर्चाएं हो रही थीं. दुनिया के एक मुल्क में मज़दूर राज कायम हो चुका था. शोषणविहीन व्यवस्था बनाने का एक नया प्रयोग हो रहा था, या यूँ कहे कि चौतरफा राजनीति थी. ऐसे गर्म व राजनीतिक माहौल में रहकर कोई नौजवान बिना प्रभावित हुए कैसे रह सकता था और यही हु.. फ़ैज की किताबों वाली आलमारी में कई ऐसी किताबों ने जगह पायी जिन्हें छुपा के पढ़ना पड़ता, जो प्रतिबन्धित किताबें थी. इनसे फ़ैज को बहुत कुछ जानने को मिला जिससे पहले वे नावाकिफ थे. इन्हीं समयों में उन्होंने अपनी भावनाओं को शब्दबद्ध करना शुरू किया.

शायरी से उनकी मोहब्बत हुई सच्चे मायने की मुहब्बत थी जो ताजिन्दगी क़ायम रही.

ग्रेजुएशन करने के बाद 1935 में फ़ैज ‘मोहम्मद एंग्लो ओरियण्टल’ कॉलेज अमृतसर में टीचर बन गए. यहाँ आकर उनकी राजनीतिक सक्रियता और साथ ही लोगों से जुड़ाव लगातार बढ़ता गया. ये दो काम उनकी पहली पसन्द के काम बन गये. यहीं पर उनकी मित्रता महमूद ज़फर और उनकी बेग़म रशीद जहाँ से हुई. इस दोस्ती ने फ़ैज की जिन्दगी को दिशा देने में बेहद अहम भूमिका निभाई. उनके अन्दर बदलाव की प्यास बढ़ने लगी. इन्ही समयों में लन्दन से पढ़कर वापस लौटे तमाम बुद्धिजीवियों की संगत में मार्क्सवाद का ककहरा सीखा. खुद फ़ैज की जुबानी कहें तो ‘‘‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ पढ़ना मेरे ख़्यालों की तब्दीली का अहम मोड़ था. अब हमारे पास नये दोस्त थे, नये लोग थे, करने के लिए बहुत कुछ था और साथ में एक ऐसी विचारधारा की रोशनी जो ऊर्जावान और आवेगमयी थी.’‘

अमृतसर में रहते हुए उनकी मुलाकात एलिस से हुई. पहली मुलाकात में ही दिल दे बैठे. और 1941 में एलिस उनकी हमसफर बन गईं. एलिस हिन्दुस्तान अपनी बहन से मिलने आई थीं. जहां फैज़ से इश्क हो गया. एलिस अमृतसर के उसी कॉलेज के प्रिसिंपल के बीवी की बहन थीं, जिसमें फ़ैज अध्यापन किया करते थे.

गर बाजी इश्क की बाजी है, तो जो भी लगा दो डर कैसा,
जीत गए तो बात ही क्या, हारे भी तो हार नहीं

मुलाकात के तकरीबन दो साल बाद दोनो ने शादी कर ली. अमृता प्रीतम को दिए गए इंटरव्यू में एलिस ने बताया कि ये दो साल का का इंतजार इसलिए था कि फ़ैज़ के वालिदैन से मंज़ूरी चाहिए थी, क्योंकि एक ख़ुशगवार माहौल के बग़ैर हम शादी नहीं कर सकते थे. शादी की रस्म कश्मीर में हुई. महाराजा कश्मीर ने अपना गर्मियों का महल हमें निकाह की रस्म के लिए दिया था और शेख़ अब्दुल्लाह ने निकाह की रस्म अदा की थी

एलिस न बताया ‘तीन आदमियों की बारात थी. एक फ़ैज़, दूसरे उनके बड़े भाई और तीसरे उनके दोस्त नईम, जब तीनों आ गए, तो मैंने फ़ैज़ साहब से पहली बात पूछी “ब्याह की अंगूठी ले कर आए हो कि नहीं? फ़ैज़ ने कहा – अंगूठी भी लाया हूं, साड़ी भी. मैं हैरान हो गई कि अंगूठी का साइज़ फ़ैज़ ने कहां से लिया है. पूछने पर कहने लगे, मैं अपने साइज़ की ले आया था.फ़ैज़ जान गए होंगे कि दिल मिल जाए तो उंगलियां भी ज़रूर मिल जाती हैं

फ़ैज़ शराब के शौकीन थे. एक बार किसी ने मज़ाक किया था कि फ़ैज़ के स्कूल का नाम स्कॉच मिशन हाईस्कूल था. लगता था कि ये तभी से तय हो गया था कि शराब से उनका साथ हमेशा के लिए रहेगा.

उनकी बेटी सलीमा कहती हैं कि वो शराब ज़रूर पीते थे लेकिन उन्हें किसी ने कभी नशे में धुत्त नहीं देखा. दरअसल जितनी वो पीते थे उतने ही शांत हो जाते थे. वैसे भी वह बहुत कम बात करते थे और दूसरों की बातें ज़्यादा सुना करते थे. उन्हें महिलाओं का साथ भी बहुत पसंद था. अली मदीह कहते हैं कि महिलाओं से ही उन्हें सीख मिली थी कि कभी भी कोई कड़वा शब्द इस्तेमाल न करें.

मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग
मैंने समझा था के तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगों हो जाए
यूँ न था, मैंने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए

मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग

अनगिनत सदियों के तारीक बहिमाना तलिस्म
रेश-ओ-अठलस-ओ-कमख़ाब-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लितड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

लौट जाती है इधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न, मग़र क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

मुझ से पहली सी मोहब्बत, मेरे महबूब, न माँग

फै़ज को 1963 में सोवियत रूस से लेनिन शांति पुरस्कार मिला. 1984 में नोबेल प्राइज के लिए उनका नामांकन किया गया था. और फिर वो दिन आया, साल था 1984 तारीख थी 20 नवंबर. जब फैज़ इस दुनिया से रुखसत हो गए. फैज़ के गुजरने के बाद उनकी आखिरी शायरी ‘ग़ुबार-ए-अय्याम’ के नाम से छापी गई.

हम मुसाफ़िर यूं ही मसरूफ़े सफ़र जाएंगे
बेनिशां हो गए जब शहर तो घर जाएंगे

किस क़दर होगा यहां मेहर-ओ-वफ़ा का मातम
हम तेरी याद से जिस रोज़ उतर जाएंगे

जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ारे-सुख़न
हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जाएंगे

नेमते-ज़ीस्त का ये करज़ चुकेगा कैसे
लाख घबरा के ये कहते रहें मर जाएंगे

शायद अपना ही कोई बैत हुदी-ख़्वां बनकर
साथ जाएगा मेरे यार जिधर जाएंगे

‘फ़ैज़’ आते हैं रहे, इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएंगे