एक ऐसा शायर जिसके मुहं से निकली हर बात शायरी बन जाती थी..

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा ‘गालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब कौन नहीं जानता. जो नहीं जानता वो इस गोले का हो ही नहीं सकता. दुनिया के सबसे नामचीन शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की आज पुण्यतिथि है. ग़ालिब का जन्‍म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था. उर्दू अदब मिर्ज़ा ग़ालिब का शायराना अंदाज आज भी रगो में दौड़ता है. रंगमच से लेकर टेलिविजन तक ग़ालिब के हर एहसास को बखूबी दिखाया गया है. ग़ालिब की शायरी की सबसे ख़ूबसूरत बात ये है कि वो किसी एक रंग या किसी एक एहसास से बंधे नहीं, हर मौज़ू पर उनका शेर मौजूद है. हिंदी सिनेमा में मिर्जा ग़ालिब के नाम से पहली फिल्म बनी थी. भारत भूषण ने ग़ालिब का किरदार निभाया था. हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी ग़ालिब पर फिल्में बनायी गई.

गुलजार ने भी मिर्जा ग़ालिब पर सन् 1988 में एक सीरियल बनाया था. जिसे काफी पसंद किया गया. नसीरुद्दीन शाह ने इसमें ग़ालिब का रोल किया था. इस अंदाज में वे खूब जमे थे. इस सीरियलएक के आने के बाद नसीर को देखते ही लोग ग़ालिब पुकारने लगते थे.

mirza_ghalib

मिर्ज़ा गालिब ने अपने फारसी के 6600 शेर और उर्दू के 1100 शेर वाले दीवान पूरे किए थे. उनका संग्रह ‘दीवान’ कहलाता है. दीवान का सीधा सा अर्थ है शेरों का संग्रह.बहुत ही छोटी उम्र में ग़ालिब की शादी हो गई थी. ऐसा कहा जाता है कि उनके सात बच्‍चे हुए, लेकिन उनमें से कोई भी जिंदा नहीं रहा सका. अपने इसी गम से उबरने के लिए उन्‍होंने शायरी का दामन थाम लिया.

ग़ालिब का वो मशहूर क़िस्सा

आपने ग़ालिब के कई किस्सें सुने होंगे लेकिन बताया जाता है की ये वाला सबसे मशहूर क़िस्सा है. एक बार ग़ालिब बहादुर शाह ज़फर और उनके कुछ साथियों के साथ बाग-ए-हयात बख्श और किला-ए-मुबारक (जिसे आप लाल किला के नाम से जानते है) में टहल रहे थे. वहां अलग-अलग किस्म के आम के पेड़ थे, जो कि सिर्फ़ बादशाह, और हरम की औरतों के लिए थे. बाहरी कोई नहीं खा सकता था.

चलते-चलते ग़ालिब हरेक आम को बड़े ध्यान से देख रहे थे. ग़ालिब को ऐसा करते देख बादशाह से रहा न गया तो उन्होंने ग़ालिब से पूछ लिया, ‘आप हर आम को इतने ध्यान से क्यों देख रहे हैं?’

ग़ालिब ने बड़ी गंभीरते से कहा, ‘मेरे बादशाह, एक बार किसी शायर ने कहा था कि हर आम पर, उसे खाने वाले का नाम लिखा होता है. मैं अपने दादा, पिता और अपना नाम तलाश रहा हूं.’

बादशाह मुस्कुराए और उन्होंने शाम तक मिर्ज़ा ग़ालिब के घर एक बास्केट भर आम भिजवा दिए. एक बार वो अपने बेहद करीबी दोस्त हकीम रज़ी उद्दीन ख़ान के साथ अपने घर के बरामदे में बैठे थे. उनके इस दोस्त को आम बिलकुल नहीं पसंद थे. तभी वहां से एक गधा-गाड़ी गुज़री. गधे ने रास्ते में पड़े आम के छिलके को सूंगा और अपना मुंह हटा लिया, फिर चलता बना.

हकीम साहब मिर्ज़ा ग़ालिब की तरफ़ मुड़े और तुरंत कहा, ‘देखो, यहां तक कि एक गधा भी आम नहीं खाता!’

ग़ालिब ने जवाब दिया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि गधे आम नहीं खाते!’

mirza-ganib

 

ग़ालिब की हवेली

दिल्ली शहर के चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन से कुछ दूर बल्लीमारान की गली कासिमजान में ग़ालिब की हवेली है. हवेली तो बस कहने के लिए है. आज कल वहां कूड़े का ढ़ेर जमा है. ग़ालिब जब आगरा से दिल्ली आए थे तो इसी हवेली में अपना आशियां बना लिया. 1857 के गदर के बाद उजड़ी दिल्ली और मिर्ज़ा साहब की किसी औलाद के न बचने के चलते ये हवेली दुनिया की नजरों से ओझल हो गई. समय के साथ इसमें मंडी लगने लगी. हीटर की फैक्ट्री खुल गई और पीसीओ बन गया. 1999 में दिल्ली सरकार ने हवेली को अपने संरक्षण में लिया. शीला दीक्षित सरकार ने इसे सुरक्षित करने के प्रयास किए. हवेली के दो कमरों और बीच के आंगन को ही संरक्षण में लिया जा सका. इसके अलावा बाकी का हिस्सा निजी संपत्ति की तरह माना जाता है…

साल 1869 में वेलेंटाइन डे के एक दिन बाद यानी 15 फरवरी, को मिर्जा गालिब का इंतकाल हो गया. वैसे ये इंतकाल सिर्फ मिर्जा गालिब के शरीर का हुआ था. ऐसी शख्सियत मरती हैं भला कहीं. मिर्जा तो हर आशिक, हर शायर के दिल में जिंदा हैं.