कविता- परदेसी की माँ

माँ के गले नहीं उतर रहा
पानी का एक घूँट
घर में कल थी दिवाली जिससे
आज दिवाला हो गया
माँ भूखी रह गई
घर-भर का निवाला हो गया

भूख की मारी दुनिया में
परदेस बसे से भूखे को
कहाँ मिले माँ के हाथ की रोटी
माँ के हाथों में रोटी रूठी
साँसें आस का जाला हो गई

आँखें रस्ता तकती थी
कब आकर आँचल में छुप जाएगा
आँखें तकती रह गई
और सपना काला हो गया

ये कविता अभिषेक चंदन ने लिखी है.

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