कविता: एक कली खिली थी अभी अभी

एक कली खिली थी अभी अभी ..
एक सुबह हुई थी अभी अभी …

सूरज देखा था पहली बार….
मन में आस जगी थी अभी अभी

इस रंग बिरंगी दुनिया को
देखा था उसने पहली बार ….

कुछ सपने प्यारे-प्यारे से
उसकी आँखों ने देखे थे …

कुछ अनकहे अहसास थे
उसने आँचल में समेटे थे ..

एक दिन पड़ी उसपर भवरे की नज़र
कली थी इससे बेखबर …

भवरे ने प्यार की नुमाइश की
कली ने खारिज उसकी ख्वाहिश की

फिर क्या भंवरा रूठ गया …
जाकर कली पर टूट गया

हाथो से जाकर मसल दिया
पैरों तले उसको कुचल दिया

वो कली पड़ी थी धरती पर
धरती से लिपट के रोई थी

चीत्कार सुनी थी दुनिया ने
पर सारी दुनिया सोयी थी …

ये खुशबू सिंह की दूसरी कविता है. पहली कविता पढ़ने के लिए click here

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