अगर भावुकता का कोई प्रदेश होता तो मध्यवर्गीय परिवार के लड़के उसकी राजधानी होते

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मध्यवर्गीय परिवार के लड़के ज़िंदगी भर लड़के ही रहते हैं, उम्र से अधेड़ हो जाएं, या बूढ़े हो जाएं…रहते वो लड़के ही हैं, बस वो बताना या जताना बंद कर देते हैं कि तमाम दुनियादारी के बीच भी उनके बीच का लड़का जिंदा बच गया है, बिल्कुल वैसे जैसे सीरिया की बमबारी के बाद ढही इमारतों के बीच से कोई जिंदा बच जाए….या फिर किसी दुश्मन देश में अपने देश के लिए जासूसी के आरोप में पूरी उम्र गुज़ार चुके उस जासूस की तरह, जिसे उसके अपने देश ने ही पहचानने से इनकार दिया था, और फिर करोड़ों यातनाओं के बाद भी वो कैद से बचकर निकल आए, या फिर उन कैदियों की तरह जिन्हें हिटलर की यातनागृह में मरना ही था, मगर कुदरत का करिश्मा कहिए की वो बचकर कहानियां बांचने के लिए निकल आए…।

कानून कहता है कि 18 साल की उम्र के बाद लड़का बालिग हो जाता है,लेकिन मध्यवर्गीय परिवार के लड़के 10 साल में बालिग हो जाते हैं…इसलिए नहीं कि वो बालिग हो जाना चाहते हैं, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उन्हें बालिग होना ही है, समय से पहले बालिग हो जाना मध्यवर्गीय परिवार के लड़कों के लिए अनिवार्य आवश्यकता है…तो क्या हुआ थोड़ा पहले बालिग हो जाएं तो…

बालिग होने से पहले मध्यवर्गीय परिवार के लड़कों को बहुत कुछ सोचना होता है, ऐसा नहीं है कि वो बेबीलोन के झूलते बगीचे के बारे में सोचते हैं, ऐसा भी नहीं कि वो सोचते हैं पामीर के पठार को देखकर वो इतराएंगे कभी, महबूबा की बाहों में बाहें डालकर पीसा की झुकी मीनार देखने की सोच से पहले भी उन्हें ये सोचना होता है कि उनका पड़ोसी उनके बारे में क्या सोचता है, क्योंकि मध्यवर्गीय परिवार के लड़के अपने मन मुताबिक नहीं उस मोहल्ले के मुताबिक अपने जीवन का चुनाव करते हैं जो उनके पड़ोसी, मोहल्ले वाले, या रिश्तेदार सोचते हैं…

मध्यवर्गीय परिवार के लड़कों के विषय का चुनाव भी अक्सर मोहल्ले वाले ही करते हैं, मसलन उनके मोहल्ले में अगर कोई इंजीनियर हो गया है तो वो दबाव में आकर गणित पढ़ते हैं, कोई आईएएस हो गया है तो वो सिविल की तैयारी करते हैं, कोई सरकारी नौकर हो गया है तो एसएससी में जान लगा देने का जुनून उनमें हिलोरें मारता है,और अगर सब बेरोजगार बैठे हैं तो जेठ की दुपहरी में वही मध्यवर्गीय परिवार का लड़का ताश खेलता है, शाम को दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाता है, और रात को सुनहरे ख्वाब बुनते हुए सो जाता है,ये सोचकर कि सुबह जल्दी उठकर दौड़ना है, और इस बार की भर्ती में हर हाल में मिलिट्री में भर्ती हो ही जाना है…

क्योंकि अगर ईश्वर ने ऊंचा कद और चौड़ी छाती दी है तो इसका अर्थ बिल्कुल यही है कि सेना में भर्ती हो ही जाना चाहिए..अगर पांच दस लाख रुपए की घूस लगे तो लगे…वॉल्टेयर के कांदीद बन जाते हैं मध्यवर्गीय परिवार के लड़के, और चल पड़ते हैं करण कारण के सिद्धांत को साधते हुए…

मध्य वर्गीय परिवार के ज्यादातर लड़के मिलिट्री में भर्ती हो भी जाते हैं, कुछ तैयारी करने निकल जाते हैं अलग अलग शहरों में, बगैर ये सोचे कि जिसे छोड़ रहे हैं, वो शहर अपना नहीं रहेगा, और जहां जा रहे हैं वो शहर अपनाएगा नहीं…

मध्यवर्गीय परिवार के लड़कों में आस्था अक्सर हिलोरें मारती है, मगर बहुत से ऐसे होते हैं जो नास्तिक बन जाते हैं, किसी ऑटो में बैठकर जब वो मुड़ी तुड़ी सीवी जेब में डाले मोबाइल पर गाना सुनते हुए निकलते हैं और शहर की लाल बत्ती पर कोई बूढ़ा बिखारी उनसे रुपए मांगता है तो वो जान निकालकर रख देना चाहते हैं, मगर उस वक्त बूढ़े को जान नहीं रुपए चाहिए होते हैं, क्योंकि भूख बड़ी जालिम होती है, उसमें न कसक होती है, न लचक होती है…मगर भिखारी को रुपए देने के लिए रुपए होने भी तो चाहिए…

गजब होते हैं ये मध्यवर्गीय परिवार के लड़के…

वो कोई मध्यवर्गीय परिवार का लड़का ही रहा होगा जिसके सामने बूढ़े भिखारी ने पहली बार अगरबत्ती का बंडल ये कहकर सामने रखा था कि बाबू खरीद लो, खाना नहीं खाया है…भिखारी से मुंह मोड़ लेने के लिए मध्यवर्गीय परिवार के किसी लड़के ने ही मोबाइल निकाला होगा और बेवजह आंखे फोन में गड़ा लेने का अभिनय किया होगा…
मंगर आंखे गड़ा लेने भर से उसे तुरंत एहसास हुआ होगा कि शर्मिंदगी की पृथ्वी उसके मन को पाताल में खींचें ले जा रही है…अपने परिवार के सबसे बुजुर्ग आदमी का पूरा चेहरा उसके सामने उसी शक्ल के तौर पर गुजरा होगा जो उसे अगरबत्ती बेच ही देना चाहता है…

मध्य वर्गीय परिवार का लड़का न चाहते हुए भी पूछ बैठता है कि, कितने की है ये अगरबत्ती ? भिखारी बताता है- चालीस रुपए की दो…मध्यवर्गीय परिवार का लड़का अपनी जेब में पड़े आखिरी चालीस रुपए निकालता है और भिखारी की ओर बढ़ा देता है, बगैर ये सोचे कि जहां जा रहा है, वहां से लौटने का इंतज़ाम कैसे होगा…

मधय्वर्गीय परिवार के उसी लड़के के मना करने के बाद भी खुद्दार भिखारी लड़के के हाथ में अगरबत्ती का बंडल पकड़ा देता है, और नौकरी का इंटरव्यू देने से पहले वही लड़का रास्ते में पड़े किसी मंदिर में सारी अगरबतित्यां मुट्ठी में भरकर राख देता है…

शाम को घर पहुंचने के बाद जब उसी मध्यवर्गीय परिवार के लड़के को मालूम चलता है कि नौकरी उसे नहीं मिली है, तो नियम यही कहता है कि उसे जार जार हो जाना चाहिए था…मगर वोमन से दुखी हो जाने के पहले प्रसन्न रहता है…क्योंकि अगरबत्ती लेने के बाद से ही वो नौकरी के बारे में नहीं, उस भिखारी के बारे में सोचता है जिसको उसने चालीस रुपए दिए थे…और ईश्वर के नाम चालीस अगरबत्त्तियों को धुंआं धुंआं किया था…

दरअसल भावुकता का अगर कोई प्रदेश होता है तो मध्यवर्गीय परिवार के लड़के उसकी राजधानी हो जाते हैं…

ये लेख अजित त्रिपाठी ने अपने फेसबुक पर लिखा था. हम यहां ले आए परमिशन के साथ. अजित इलाहाबाद से है. वही इलाहाबाद जहां से अमिताभ बच्चन है. जनाब आज तक में काम करते हैं. फेसबुक पर इनकी वनलाइन हचककर बिकती हैं.