‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के भारत पहुंचने से लेकर, भारत में समाने तक की पूरी कहानी

आज से लगभग 418 साल पहले, जब कुछ अंग्रेज व्यापारियों ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ से भारत में व्यापार करने की अनुमति मांगी थी. महारानी ने अनुमती दे दी. अब अंग्रेज व्यापारियों को व्यापार के लिए एक कंपनी की जरूरत थी. तो एक कंपनी बना दी गई. नाम रखा गया “ईस्ट इंडिया कंपनी”

ईस्ट इंडिया कंपनी का अस्तित्व बार-बार संकट में पड़ जाता था। एक बार, क्रोमवेल के संरक्षण काल में, वर्षों के लिए उसे स्थगित कर दिया गया था. एक बार, विलियम तृतीय के शासनकाल में, पार्लियामेंट के हस्तक्षेप के द्वारा उसे बिलकुल ही खतम कर दिए जाने का खतरा पैदा हो गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अस्तित्व को पार्लियामेंट ने उस डच राजकुमार के उत्थान काल में तब स्वीकार किया था जब ह्विग लोग ब्रिटिश साम्राज्य की आमदनियों के अहलकार बन गए थे. तब तक बैंक ऑफ इंगलैंड का जन्म हो चुका था.

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ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में कैसे पाँव ज़माए-

साल 1608 में भारत में व्यापार के इरादे से इंग्लैड़ से ‘हेक्टर’ नाम का एक ज़हाज़ भारत के लिए रवाना किया गया. इस ज़हाज़ का जो कैप्टन था. उसका नाम था हॉकिंस. हॉकिंस ने उपने जहाह को सबसे पहले सूरत के बन्दरगाह पर रुकवाया. औज कि तरह उस दौर में भी सूरत भारत का एक प्रमुख व्यापारिक केन्द्र था. हॉकिन्स जब भारत आया तो वो राजदूत बनकर सबसे पहले मुगल बादशाह जंहागीर के पास पहुंचा.

हॉकिंस इंग्लैण्ड के सम्राट का राजदूत बनकर आया था, इसलिए जहाँगीर ने भारतीय परंपरा के अनुसार अतिथि का विशेष स्वागत किया. साथ ही उसे पुरस्कार करके सम्मानित किया. शायद, उस वक्त जहांगीर इस बात से अंजान रहा होगा कि जिस अंग्रेज कौम के नुमाइन्दे को वह सम्मानित कर रहा है, एक दिन उसी कौम के वंशज भारत पर शासन करेंगे और हमारे शासकों और जनता को अपने सामने घुटने टिकवाकर सलाम कराएँगे.

चूंकि, अंग्रेजों के आने से पहले पुर्तगाली भारत आ चुके थे… साथ ही वह जहॉंगीर को प्रभावित भी कर चुके थे, इसलिए हॉकिंग्स के समाने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह उन्हें अपने रास्ते से कैसे हटाए. इसके लिए उसने जहाँगीर को पुर्तगालियों के खिलाफ भड़काना शुरु कर दिया और वह अपनी योजना में कामयाब रहा.

यही नहीं वह जहाँगीर से कुछ विशेष सुविधाएँ और अधिकार लेने में भी सफल रहा. बाद में जल्द ही हॉकिंग्स ने पुर्तगालियों के जहाजों को लूट लिया. असल में वह जल्द से जल्द सूरत में पुर्तगालियों का व्यापार ठप्प कर देना चाहता था, ताकि उसका रास्ता साफ हो सके.

इसी कड़ी में 6 फरवरी 1663 को उसने बादशाह ज़हाँगीर से एक शाही फरमान जारी करवा लिया. इसके तहत अंग्रेजों को सूरत में कारखाना बनाकर व्यापार करने की इजाजत मिल गई. इसी के साथ ज़हाँगीर ने यह इजाजत भी दे दी कि उसके राज-दरबार में इंग्लैण्ड का एक राजदूत रह सकता है, जिसके तहत ‘सर थामस रो’ 1615 में राजदूत बनकर भारत आया.

‘थॉमस रो’ अपनी कूटनीति के लिए पूरे ब्रिटेन में मशहूर था. उसके बारे में कहा जाता था कि वो इंग्लैंड की महारानी क्वीन एलिजाबेथ के शुरु से ही काफी करीबी थे. 1597 में मिडल टेंपल (वकीलों की खास जगह) में शामिल होते ही वह महारानी एलिजाबेथ प्रथम के विश्वासपात्र बन गए थे.

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बादशाह का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र दिखाकर करने लगे लूटमार-

अब अंग्रेज अफसर थोमस रॉ ने मुगल सम्राट जहाँगीर को अंग्रेजी भाषा में पत्र लिखा जिसमे वो भारत के व्यापार करने के लिए ट्रेड लाइसेंस चाहते था. Trade शब्द को सरल भाषा में समझाएं तो उस ज़माने में इसका अर्थ होता था लूटमार. रो को पता था कि जहांगीर को अंग्रेजी नहीं आती थी. इस कारण उसने अपने एक दरबारी से पत्र पढने को कहा और उस दरबारी को थोमस ने पहले ही खरीद लिया था. अब जहांगीर उस दरबारी की विश्वनीयता के चलते ईस्ट इंडिया कम्पनी के Trade वाले पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह उनको लूटमार की छुट मिल गयी. अब वो जहां पर भी जाते, बादशाह का हस्ताक्षर किया हुआ पत्र बताकर लूटमार करते थे.

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अंग्रेजों ने कई कारखाने भी खोल दिए और साथ-साथ लूटमार भी. लूटमार का तरीका ऐसा होता था कि भारत की भोली जनता उनकी योजनाओ को भांप नहीं पाती थी. उन्होंने सबसे पहले सुरत से लगभग 900 जहाज भरकर सोना लन्दन में भेजा था और इस तरह सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत को लूटना शुरू कर दिया. अब उन्होंने लूटमार के साथ साथ राज भी करना चाहा लेकिन कई वर्षो तक राज करने में असफल रहे क्योंकि भारत के अधिकतर राजाओं ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने प्रदेश में राज नहीं करने दिया. अब उस समय बंगाल बहुत बड़ा प्रदेश हुआ करता था. जिसके राजा का नाम था सिराजुदोला .

साल 1757 में राबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजों ने बंगाल पर हमला करने का विचार किया. राबर्ट क्लाइव के पास उस समय केवल 350 सैनिक ही थे. इस लिए उसने षड्यंत्र की रणनीति बनाई और सिराजुद्दौला के सेनापति मीर जाफर को धन और सत्ता का लालच लेकर अपनी तरफ कर लिया. अब जब प्लासी के युद्ध का समय आया तो खुद सिराजुद्दौला युद्ध में नही गया क्योंकि उसे पता था कि उनके सैनिक कुछ ही समय में अंग्रेजो को खत्म कर देंगे लेकिन उनको मीर जाफर की गद्दारी का पता नही था.

मीर जाफर ने अपनी पुरी सेना को युद्ध लड़े बिना समर्पण करने को कहा और इतिहास में इसे अंग्रेजो की जीत कहा जाता है. राबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला की पूरी सेना को बंदी बना लिया. मीर जाफर और रोबर्ट क्लाइव ने योजना बनाकर सिराजुद्दौला को भी मरवा दिया और मीर जाफर को सिंहासन पर बैठा दिया. मीर जाफर ने रोबर्ट क्लाइव को बंगाल का गर्वनर नियुक्त कर दिया और इस तरह सत्ता में भी ईस्ट इंडिया कंपनी आ गई.

धीरे-धीरे ईस्ट इंडिया कंपनी का वर्चस्व पूरे भारत में बढ़ता गया. इस तरह जिस कंपनी के लिए कभी पुर्तगाली मुसीबत हुआ करते थे, वह कंपनी उनके वर्चस्व को खत्म करते हुए भारत में मजबूती से स्थापित हो चुकी थी. आगे इतिहास गवाह है कि इस कंपनी ने कितनी तेजी से अपने पांव पसारे.

ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में जितने साल भी रहीं वह मुनाफे में ही रही-

इतिहासकार बताते हैं कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में जितने साल भी रहीं वह मुनाफे में ही रही. एक छोटी सी पूंजी के साथ भारत आने वाली कंपनी के बारे में कभी भी किसी ने ऐसा नहीं सोचा था कि, वह यहां 200 साल से ज्यादा राज करेगी.

अपने सफर में इसने वह समय भी देखा, जब चारों तरफ उसका डंका ही बजा. इसे कंपनी का भाग्य कह लीजिए या कुछ और, पर अपने बलबूते कई राज्यों पर इसने अपना कब्जा जमाया. आप जितनी भी पुरानी ईमारतें, ट्रेन, कारखाने वगैरह देखते हैं, उसमें से ज्यादातर अंग्रजों के जमाने की ही हैं. उन्होंने इसे अपनी सुविधा के लिए बनाया था, जोकि आज तक बनी हुई हैं.

Sanjiv-Mehta

भारत पर करीब 200 वर्ष तक राज करने वाली और इस देश को अपना गुलाम बनाकर रखने वाली ईस्टर इंडिया कंपनी को 450 साल बाद एक भारतीय ने खरीद लिया. जिसने खरिदा उसका नाम है संजीव मेहता.

मुंबई के बिजनेसमैन संजीव को इस कंपनी को खरीदने के लिए एक बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी है. संजीव ने 15 मिलियन डॉलर की कीमत अदा करके खरीदा है. अब यह कंपनी ब्रिटिश नागरिक नहीं बल्कि एक भारतीय के मालिकाना हक वाली कंपनी है. इस कंपनी को खरीदने के लिए संजीव ने कंपनी के 40 शेयर धारकों से वर्ष 2010 में डील फाइनल की थी. संजीव ने बताया कि इस डील को सफल बनाने के लिए उन्होंने दिन-रात एक कर दिया था और 5 तक वह कोई काम नहीं किया बस यही सोचते रहते थे कि आखिर कैसे वह इस कंपनी के मालिक बनें.